संदेश

चलन नहीं देवों के वंदन, करके उन्हें बुलाया जाये; इसीलिये गीता की झूठी, कसमें अब मैं खाता हूँ।
...“निश्छल”

06 June 2019

चलो, कह दे रहा हूँ मैं

चलो, कह दे रहा हूँ मैं
✒️
चलो, कह दे रहा हूँ मैं, महकता है चमन, फिर भी
महज़ इक फूल को फिर से, ज़रा पुचकार कर देखो।

चलीं हैं आज जल-थल में
गरल बनकर हवाएँ भी,
कभी भी बात ना करतीं
अकेले में दिशायें भी।

मछलियाँ अब नहीं दिखतीं, भला यह कौन कहता है?
सजल सी आँख की जालें, ज़रा सी डालकर देखो।।

उगे हैं बादलों को पर
कुतरने को पड़ा सूरज,
विकल हो, आसमानों से
शिकायत क्या करे नीरज?

अगर शिकवे करे दिनभर, कुदरती माननीयों से
सुबह खिलना उसे पड़ता, बला यह जानकर देखो।।

मुखौटों को बदलकर ही
निकलता चाँद रातों में,
रसिक भी गीत गाते हैं
सुरों को बाँध गातों में।

किसी को फ़र्क क्या पड़ता, अगर बरसात में पूछो
निकलकर गाँव के बाहर, छतरियाँ तानकर देखो।।

बहुत ही सब्ज़ हैं साँसें
शजर के पत्तियों की अब,
महल की सेविकाएँ भी
किसी से बात करतीं कब?

कुलीनों की गली में हैं, विषैले नाग से गुंडे
कि नाज़ुक मन रखा किसने, किहुनियाँ मारकर देखो।।
...“निश्छल”

27 May 2019

फिर अधूरा चाँद कोई

फिर अधूरा चाँद कोई
✒️
लेखनी! आराम कर अब, ज्योति सूरज की ढली है।
फिर अधूरा चाँद कोई, रात को रौशन करेगा।

ज्ञान के दीपक जलाकर
दूर करने को अँधेरे,
ख्याति अर्जन के तरीके
और हैं, बहुधा घनेरे।

जो जगत का मार्गदर्शन, स्वार्थ को तजकर करेगा।
फिर अधूरा चाँद कोई, रात को रौशन करेगा।

टूट जाने को विवश हैं
तारकों के बंध सारे,
चिर अँधेरी रात में हैं
जुगनुओं से मीत प्यारे।

जो, समय की रीत को तज, प्रेरणा मन में भरेगा।
फिर अधूरा चाँद कोई, रात को रौशन करेगा।

अड़चनों की खोल साँकल
निर्भयी, रातें गुजारे,
शांति से, नभवास में भी
कांतिमय मुख से निहारे।

धूप का मारा चहककर, व्योम को शीतल करेगा।
फिर अधूरा चाँद कोई, रात को रौशन करेगा।

है मलिन सी प्रीति की छवि
यह, ज़माना बाँचता है,
डालकर परदे लबों पर
निर्जनों में जाँचता है।

दिव्य सी आभा प्रखरतम, प्रेम की, जग में भरेगा।
फिर अधूरा चाँद कोई, रात को रौशन करेगा।
...“निश्छल”

26 May 2019

लेखनी! उत्सर्ग कर अब

लेखनी! उत्सर्ग कर अब
✒️
लेखनी! उत्सर्ग कर अब, शांति को कब तक धरेगी?
जब अघी भी वंद्य होगा, हाथ को मलती फिरेगी।

साथ है इंसान का गर, हैं समर्पित वंदनायें;
और कलुषित के हनन को, स्वागतम, अभ्यर्थनायें।
लेखनी! संग्राम कर अब, यूँ भला कब तक गलेगी?

हों निरंकुश मूढ़ सारे, जब उनींदी साधना हो;
श्लोक, पन्नों पर नहीं जब, कागज़ों पर वासना हो।
“नाश हो अब सृष्टि का रब”, चीखकर यह कब कहेगी?

अंत में सठ याचना के, भी मिले गर मृत्यु निश्चित;
दूर रहना श्रेयवर्धक, मत, युगों से है सुनिश्चित।
काट उँगली को तिलक कर, सामना, कह कब करेगी?

किंतु, क्या रण छोड़ देना, श्रेष्ठ निर्णय है विकल्पित?
या विलापों से प्रलय को, ध्येय है, करना निमंत्रित?
लेखनी! अब युद्ध कर ले, अट्टहासें कब तजेगी?
...“निश्छल”

25 May 2019

धीर धरो हरदम रचनाओं

धीर धरो हरदम रचनाओं
✒️
नपे-तुले कदमों से चलकर,
पाठक मन में जाना कृतियों;
अल्हड़पन की आतुरता भी,
पीड़ा का अध्याय बनेगी।

तुम्हें सौंह है मनोभाव की
भूल न जाना गतियाँ अपनी,
व्याकुल मन की आकुलता में
तिरती रहतीं कृतियाँ जितनी,
चीख पड़ेंगीं आहत होकर
उत्कंठा, अभिशाप बनेगी।

विकल हृदय को थाम खड़ा है
साधक, कठिन साधना करता,
विनययुक्त हो, त्याग धृष्टता
बौरयुक्त मन धीरज धरता,
धीर धरो हरदम रचनाओं
अक्षुण्णता वरदान बनेगी।

मद्धम-मद्धम पदचापों से
नाप-नापकर कदम बढ़ाना,
आशु श्रव्य गीतों की सरिता
हित साधक मत तुम बन जाना,
करतलध्वनि की परम लिप्तता
संहारक पर्याय बनेगी।।
...“निश्छल”

20 May 2019

हार बैठा भाग्य मुझसे

हार बैठा भाग्य मुझसे
✒️
आज फिर चाँद, मेरे द्वार आया
आज फिर, आँसुओं ने गिड़गिड़ाया,
वो खुशी, जो माँग रखी थी युगों से
भाग्य लेकर, स्वयं मेरे द्वार आया।

जन्नतों की सैर ना चाहा कभी भी
ना कभी देवों से मैंने याचना की,
क्यों करूँगा वैर यम के दूत गण से?
मित्रवत ही साथ उनके साधना की;
क्या इसी को मानकर कुछ तथ्य ऐसे
दैव मुझ पर था बड़ा ही ज़ुल्म ढाया?
वो खुशी,...

भाग्य, मेरे कर्म की पुस्तक लिए,
चिढ़-चिढ़ बुझाता, प्रज्वलित थे जो दीये
अंशुमाली है खड़ा दरबार मेरे
अभय देता हूँ उसे शोभित किये;
खो गई क्या, जीर्ण पोथी भाग्य की अब?
उपक्रमों को और, या वह आजमाया?
वो खुशी,...

ज्योति जब परिधान पहने सप्तरंगी
आलना में झाँक मेरे, स्नेह बैठी,
अँगड़ाइयाँ लेकर उठा तब सुर्ख़ रवि
खेवटों की नाव देखे झील ऐंठी;
स्रवित करता चक्षुओं से, स्नेह वर्षण
सँवर कर उस भोर में पीयूष आया,
वो खुशी,...

बाँचता है रात को विस्तार देकर
तारकों के भाल पर तलवार लेकर,
मान बैठा था जिसे बिल्कुल निकम्मा
रौद्र धारण है किये, सम्मान देकर;
या, हुआ है गर्क, बेड़ा अर्क का अब
हार बैठा भाग्य मुझसे, या ख़ुदाया,
वो खुशी, जो माँग रखी थी युगों से
भाग्य लेकर, स्वयं मेरे द्वार आया।
...“निश्छल”